Black Holes | ब्लैक होल के रहस्यों को डिकोड करना। | ब्रह्मांड की अजीब चीज। | सब कुछ।

इस ब्रह्मांड में कई ऐसी चीजें हैं जिनके बारे में अभी तक हम ज्यादा कुछ जान नहीं पाए हैं। ब्लैक होल्स भी इनमें से एक है।

अगर आप ब्लैक होल के बारे में पहले से नहीं जानते तो मैं आपको यह बता दूं कि स्पेस में कुछ ऐसे प्लेसेस होते हैं जहां ग्रेविटी का खिंचाव इतना ज्यादा होता है कि अपने नजदीक आने वाले हर ऑब्जेक्ट को निगल लेते हैं। यहां तक की लाइट भी वहां से वापस नहीं लौट पाती। इस कारण यह हमें दिखाई नहीं देते। ऐसे प्लेसेस को हम ब्लैक होल्स कहते हैं। इनके बारे में हम यह तो जानते हैं कि यह कैसे बनते हैं, इनके बाहर क्या होता है और इन्हें डिटेक्ट कैसे करना है। पर आज भी हम यह नहीं जान पाए हैं कि इनके अंदर क्या होता है। प्रैक्टिकली यह जान पाना भी लगभग नामुमकिन ही है क्योंकि अगर हम ब्लैक होल के अंदर कोई प्रोप भेज भी देते हैं तो वह ब्लैक होल के ग्रेविटी के प्रभाव से कभी निकल नहीं पाएगा और ना ही हमें कोई सिग्नल भेज पाएगा।
इसलिए फिलहाल हमारे लिए बेहतर यही है कि हम ब्लैक होल्स को थियोरोटिकली ही समझे। आज के एपिसोड में हम जानेंगे कि ब्लॉक होल्स कैसे बनते हैं। इनका आकार कैसे बढ़ता है। इनके नजदीक चमकने वाली लाइट का क्या कारण होता है तथा इनके अंदर क्या चल रहा होता है। तो चलिए शुरू करते हैं आज का एपिसोड।

आप जानते हैं कि ब्लैक होल स्पेस में वैसे प्लेसेस होते हैं जहां ग्रेविटी का प्रभाव इतना ज्यादा होता है कि खुद लाइट भी वहां से वापस नहीं आ पाती। इसलिए यह हमें दिखाई भी नहीं देते। पर क्या आपको पता है कि यह बनते कैसे हैं? आपने अक्सर केवल यही सुना होगा कि ब्लैक होल का निर्माण तब होता है जब विशाल तारों का मैटर एक छोटे से जगह में कंप्रेस हो जाता है। ऐसा अक्सर सुपरनोवा एक्सप्लोजन के बाद होता है जब कोई विशाल तारा खत्म होने के कगार पर होता है। पर क्या हो, अगर मैं आपसे यह कहूं कि इस ब्रम्हांड में मौजूद हर वस्तु से ब्लैक होल का निर्माण हो सकता है। यहां तक कि आपसे भी। जी हां, सही सुना आपने, हम जानते हैं कि हर ऑब्जेक्ट का अपना कुछ मास होता है। अगर इस मास को हम उसके Schwarzschild radius से बने स्फेयर के अंदर कंप्रेस कर दें तो वह ऑब्जेक्ट एक ब्लैक होल बन जाएगा। अब अगला सवाल यह उठता है कि ये Schwarzschild radius है क्या? तो चलिए जानते हैं कि यह क्या है? आप जानते होंगे कि सर्कल के स्पेयर के सेंटर से इसके बाउंड्री तक की दूरी समान होती है जिसे हम रेडियस के नाम से जानते हैं। Schwarzschild radius भी एक ऐसा ही रेडियस है, पर साधारण रेडियस और इसमें अंतर यह है कि इससे बनने वाले स्फेयर में अगर हम किसी ऑब्जेक्ट के मास को कंप्रेस कर दें तो वह ऑब्जेक्ट एक ब्लैक होल बन जाएगा।

हर ऑब्जेक्ट का Schwarzschild radius अलग अलग होता है, जिसे आप इस फार्मूले से निकाल सकते हैं।
यहां G ग्रेविटेशनल कंटस्टेंट है, M ऑब्जेक्ट का मास तथा C लाइट की स्पीड है। जैसा कि इस चार्ट में आप देख सकते हैं, हमारे सूर्य का Schwarzschild radius लगभग 3 किलोमीटर है।
इसका मतलब यह है कि अगर हम सूर्य को दबा-दबा कर एक ऐसे स्फेयर के अंदर सीमित कर दें, जिसका रेडियस केवल 3 किलोमीटर हो तो यह एक ब्लैक होल बन जाएगा। इसी तरह पृथ्वी को एक ब्लैक होल बनाने के लिए हमें इसे लगभग 9 मिली मीटर के रेडियस वाले स्फेयर में सीमित करना होगा। पर हमारे पास ऐसा कोई तरीका नहीं है जिससे कि हम ऐसा कर पाए। पर बड़े तारे जो हमारे सूर्य से कई गुना बड़े होते हैं, उनका Schwarzschild radius भी ज्यादा बड़ा होता है। जब ऐसे तारों का ईंधन खत्म हो जाता है तो वह खुद को पहले की तरह गर्म नहीं रख पाते और बेहद ही छोटे स्पेस में सिमट कर रह जाते हैं। इस छोटे से स्पेस को हम सिंगुलेरिटी के नाम से जानते हैं।
इसकी डेंसिटी अनंत हो जाती है। इस कारण इसका ग्रेविटेशनल पुल इतना अधिक हो जाता है कि कोई भी वस्तु इससे बाहर नहीं आ पाती। यहां तक की लाइट भी नहीं। आमतौर पर इस सिंगुलेरिटी को हमें छोटे से बिंदु या कंड़ के रूप में दर्शाते हैं। पर असलियत में यह कोई फिजिकल नहीं बल्कि infinitesimally small mathematical point होता है। आशा करता हूं कि अब तक आप ही समझ चुके होंगे कि ब्लॉक होल्स बनते कैसे हैं। चलिए अब जानते हैं कि यह बड़े कितने होते हैं। यूं तो ब्लैक होल्स अलग-अलग साइज के होते हैं पर आकार तथा मास के अनुसार उन्हें तीन भागों में बांटा गया है। सबसे छोटे आकार के ब्लैक होल्स को primordial ब्लैक होल कहा जाता है। साइंटिस्ट मानते हैं कि ऐसे ब्लैक होल्स का निर्माण बिग बैंग के तुरंत बाद हुआ होगा। इन ब्लैक होल का साइज मात्र एक atom के आकार का ही होता है। पर इनका मास किसी विशाल पहाड़ के मास के बराबर होता है। सबसे ज्यादा मात्रा में डिटेक्ट किए जाने वाले ब्लैक होल्स मीडियम साइज के होते हैं तथा इन्हें स्टेलर ब्लैक होल कहा जाता है। इस तरह के ब्लॉक होल्स का मास हमारे सूर्य के मास से 20 गुना ज्यादा तक होता है। पर यह मास कंप्रेस होकर केवल एक छोटे से स्फेयर में ही सिमट कर रह जाता है जिसका डायमीटर केवल 10 मील के बराबर ही होता है। कुछ ब्लैक होल्स आकार में काफी विशाल होते हैं। इस तरह के ब्लॉक होल्स उसको supermassive ब्लैक होल कहा जाता है।
इस तरह के ब्लॉक होल्स का मास इतना होता है जितना हमारे सूर्य के आकार के 10 लाख से भी ज्यादा तारों के मास को आपस में मिलाने से होगा। पर यह कंप्रेस होकर केवल इतने बड़े स्फेयर तक ही सिमट कर रह जाता है जिसका डायमीटर लगभग हमारे सोलर सिस्टम के आकार के बराबर होता है। साइंटिफिक एविडेंस हमें बताते हैं कि सभी बड़े गैलेक्सीस के सेंटर में ऐसा एक ब्लैक होल जरूर मौजूद होता है। कई लोगों ने हमसे यह पूछा कि हमारी गैलेक्सी के बीच जो ब्राइट लाइट नजर आती है, वह क्या है?
जवाब यह है कि मिल्की वे गैलेक्सी की जो भी तस्वीरें आप देखते हैं, वह असली नहीं होती। ज्यादातर केसेस में वह केवल आर्टिस्टिक इंप्रेशन होता है। सच्चाई यह है कि गैलेक्टिक डस्ट के कारण हम अपने गैलेक्सी के सेंटर में देख ही नहीं पाते। इसे हम इंफ्रारेड वेवलेंथ में बेहतर तरीके से देख सकते हैं।

Hubbell द्वारा मिल्की वे गैलेक्सी के सेंटर से आ रही इन्फ्रारेड रेज का अध्ययन करने के बाद हमें यह पता चला कि हमारे गैलेक्टिक सेंटर में काफी मात्रा में तारे और डस्ट मौजूद है। शायद इसलिए आर्टिस्ट मिल्की वे के सेंटर में एक ब्राइट लाइट को दर्शाते हैं। 
हमारे गैलेक्टिक सेंटर में ब्राइट लाइट को दर्शाने का एक और कारण Quasar भी हो सकता है।
हमारी मिल्की वे गैलेक्सी के सेंटर में भी एक सुपरमैसिव ब्लैक होल मौजूद है, जिसका नाम है Sagittarius A इस्का मास लगभग 40 सूर्य के मास के बराबर है। जबकि यह मास केवल इतने बड़े स्फेयर में ही सीमित है जिसका डायमीटर सूर्य के बराबर है। इसी ब्लैक होल की मोजुदगी के कारण वहां Quasar मोजूद है, जो हमें चमकता हुआ दिखाई देता है। पर इसकी चमक अब काफी धुंदली हो चुकी है। इसलिए Quasar के बेस पर हमारे गैलेक्टिक सेंटर में चमकदार लाइट को दर्शाना गलत होगा। अब आप सोच रहे होंगे कि यह Quasar क्या होता है और अगर यह ब्लैक होल के नजदीक मौजूद होता है तो यह चमक कैसे सकता है।
क्योंकि हम सब को तो यह मालूम है कि ब्लैक होल में ग्रेविटी का अट्रैक्शन इतना ज्यादा होता है कि खुद लाइट भी इसने वापस नहीं आ पाती। चलिए समझते हैं Quasar को और जानते हैं इन प्रश्नों के उत्तर। Quasar, quasi stellar ऑब्जेक्ट का शॉर्ट नेम है। जैसा कि मैंने पहले ही बताया, हर बड़े गैलेक्सी के सेंटर में एक बहुत बड़ा ब्लैक होल मौजूद होता है। इन ब्लैक होल्स के नजदीक जो भी आता है यह उसे निगल लेते हैं। पर ऐसा नहीं होता कि कोई भी ऑब्जेक्ट सीधे इनके सेंटर में ही खिंचा चला जाता है। दरअसल जो भी ऑब्जेक्ट इन ब्लैक होल के नजदीक जाता है वह पहले एक डिस्क के आकार में ब्लैक होल का चक्कर लगाता है और उसके बाद ही ब्लैक होल के अंदर जाता है। इस डिस्क को accretion disk कहा जाता है।
जब बहुत सारे ऑब्जेक्ट इस accretion डिस्क में तेज गति से ब्लैक होल का चक्कर लगा रहे होते हैं तो फ्रिक्शन तथा ग्रेविटेशनल फोर्स के कारण उनके बीच काफी ज्यादा हिट उत्पन्न हो जाती है। जिस तरह गर्म ऑब्जेक्ट लाइट और रेडिएशन एमिट करते हैं, उसी तरह accretion डिस्क में मौजूद ऑब्जेक्ट भी काफी गर्म होने के कारण लाइट और रेडिएशन एमिट करते हैं। यही वो चमकीली लाइट होती है जो हमें दिखाई देती है। इसलिए ऐसा ना समझें कि यह लाइट ब्लैक होल से आती है। ब्लैक होल से लाइट का बाहर आना तो असंभव होता है। ब्लैक होल के पास निगलने के लिए जितने ज्यादा मटेरियल होंगे, यह लाइट उतनी ही ज्यादा चमकीले होगी। ऐसा भी नहीं है कि सभी सुपरमैसिव ब्लैक होल्स के पास हमेशा ऐसी लाइट निकलती रहती है। जैसा कि मैंने पहले ही बताया, इस तरह की लाइट हमें केवल तभी दिखाई देती है जब ब्लैक होल मटीरियल को निगल रहा होता है। अगर किसी ब्लॉक होल के पास निगलने के लिए कोई मटेरियल ना हो। तो उनके पास ऐसी कोई लाइट हमें देखने को नहीं मिलती। आम तौर पर केवल उन्हीं गैलेक्सी इसमें क्वासर का निर्माण होता है जो या तो इतने यंग है कि इनके पास इन के सेंटर में मौजूद ब्लॉक खोल को खिलाने के लिए काफी ज्यादा मात्रा में मटेरियल मौजूद है या फिर तब जब दो गैलेक्सी आपस में टकराते हैं। क्योंकि जब ऐसा होता है ब्लैक होल के पास खाने के लिए काफी मात्रा में मैटेरियल्स होते हैं। जो कि सुपरमैसिव ब्लैक होल्स हर साल लगभग सूर्य के मास के बराबर मास को कंज्यूम कर लेते हैं, यह नोर्थ तथा साउथ पोल में काफी मात्रा में एनर्जी इजेक्ट करते रहते हैं। एस्ट्रोनॉमर इसे कॉस्मिक जेट कहते हैं। जो कि हम गैलेक्सीस फॉरमेशन के बारे में काफी कम जानते हैं, quasar के बारे में कुछ एस्ट्रोनॉमर यह भी मानते हैं कि यह गैलेक्सी के अर्ली स्टेज ऑफ फॉर्मेशन को रिप्रेजेंट करते हैं। हम में से ज्यादातर लोग यही सोचते हैं कि ब्लैक होल की ग्रेविटी इतनी ताकतवर होती है कि यह दूर से ही ऑब्जेक्ट को अपनी तरफ खींच लेते हैं। पर असल में ऐसा नहीं है। जब तक कोई ऑब्जेक्ट इनके काफी करीब ना चला जाए ब्लैक होल्स उन्हें खींच नहीं पाते। यही कारण है कि हम कई बार प्लैनेट और स्टार्स को इसका चक्कर लगाते हुए देखते हैं। इंटरस्टेलर फिल्म में भी ऐसा ही प्लेनेट दिखाया गया था।
यह ऐसा ही है जैसे अगर किसी कारण से हमारा सूर्य ब्लैक होल में बदल जाए तो ऐसा नहीं होगा कि सारे प्लेनेट इसके ग्रेविटी के प्रभाव में आकर तुरंत इसके अंदर समा जाएंगे। होगा यह की सूर्य ना रहने के कारण सारे ग्रह पर अंधेरा तो जरूर छा जाएगा, पर सारे ग्रह फिर भी पहले की तरह ही बीच में मौजूद ब्लैक होल का चक्कर लगाते रहे। यहां कई लोग यह कहेंगे कि सूर्य कभी ब्लैक होल बन ही नहीं सकता। जी हां, सही कहा आपने यह केवल उदाहरण है। अगर हकीकत की बात की जाए तो सूर्य का मास इतना ज्यादा अधिक नहीं की यह ब्लैक होल बन पाए। अरबो सालो बाद जब सूर्य अपनी आखिरी सांसें ले रहा होगा तो वह रेड जाइंट स्टार बन जाएगा और जब इसका इंधन पूरी तरह से खत्म हो जाएगा यह प्लैनेटरी nebula में बदल जाएगा। अंत में हमारा सूर्य एक ठंडा होता व्हाइट ड्रॉफ तारा बनकर रह जाएगा। ब्लैक होल्स बारे में सबसे बड़ी मिस्ट्री यह है कि हमें यह बिल्कुल भी पता नहीं है कि इसके अंदर क्या होता है। करंट थियोरीज यह प्रेडिक्ट करते हैं कि ब्लैक होल के द्वारा निगले गए सारे मैटर इसके सेंटर में जाकर एक mathematically infinitesimall point में स्क्वीज हो जाते हैं, जिसे हम सिंगुलेरिटी के नाम से जानते हैं। पर हम अभी तक यह नहीं समझ पाए हैं कि ये सिंगुलैरिटी काम कैसे करता है। क्योंकि सिंगुलेरिटी का मास काफी ज्यादा होता है पर साइज काफी छोटा इसके व्यवहार को समझने के लिए हमें थ्योरी ऑफ ग्रेविटी को क्वांटम फिजिक्स से कंबाइंड करने की जरूरत है। इस यूनिफाइंड थियोरी पर पहले से ही काम चल रहा है तथा इसे क्वांटम ग्रेविटी का नाम दिया गया है। फिलहाल अभी तक हमारे पास कोई भी वर्किंग क्वांटम ग्रेविटी थ्योरी नहीं है। 
Wormholes, Einstein field equation के मिस्टीरियस सॉल्यूशंस है।
अगर इनके बारे में आप नहीं जानते तो हमें कमेंट में बताएं, हम इनके ऊपर अलग से आर्टिकल बनाएंगे। संक्षेप में कहूं तो यह space-time के दो भागों को शॉर्टकट के जरिए जोड़ता है, जिसका अगर इस्तेमाल किया जाए तो हम ब्रह्मांड में काफी दूर मौजूद किसी दूर के ग्रह पर लाइट से भी पहले पहुंच सकते हैं।
पर Wormholes अभी तक केवल थ्योरी में ही एक्जिस्ट करते हैं। असल में किसी भी तरह के Wormhole को अभी तक देखा नहीं गया है। पर अगर बात करें ब्लैक होल की हम जानते हैं कि यह निश्चित रूप से एक्सिस्ट भी करते हैं और शायद यह एक wormhole की तरह काम भी कर सकते हैं।
आइंस्टाइन के जनरल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी से हमें यह पता चलता है कि हर तरह का मास स्पेस को वोप करता है। मास जितना ज्यादा होगा, स्पेस उतना ही ज्यादा वोप करेगा।
अब अगर एक ब्लैक होल के मास को देखें तो यह काफी ज्यादा होता है। इसका मतलब यह हुआ कि यह space-time को इतना वोप कर देगा कि यह हमारे लिए दूसरे ब्रह्मांड या किसी दूसरे समय काल में जाने के लिए एक ब्रिज जैसा होगा। यानी कि एक वर्किंग Wormhole. पर बिना एक्सपेरिमेंटल डाटा और ऑब्जरवेशन के फिलहाल यह सब अभी मात्र स्पैक्यूलेशन ही हैं। पर अगर किसी तरह ऐसा हो भी जाता है तो एक जीवित व्यक्ति के लिए सिंगुलेरिटी के आगे जीवित बच पाना नामुमकिन है। जैसे-जैसे आप सिंगुलेरिटी के नजदीक बढ़ते जाएंगे, आपका शरीर खींचता चला जाएगा। आपके शरीर के मॉलिक्यूल भी स्ट्रेच होते जाएंगे और एक समय ऐसा आएगा जब इससे आपकी मौत हो जाएगी। सिंगुलेरिटी में पहुंचने पर क्या होगा यह अभी तक हम नहीं जानते। पावरफुल ग्रेविटी के प्रभाव के कारण हुए इस तरह के स्ट्रैचिंग को Spaghettifucation कहा जाता है।
जिस तरह हम यह नहीं जानते कि ब्लैक होल के अंदर क्या होता है। हम यह भी नहीं जानते कि ब्लैक होल हमेशा जिंदा रहता है या फिर उस समय नष्ट हो जाता है जब उसके पास निगलने को कुछ नहीं होता। Stephen Hawking की मानें तो ब्लैक होल हमेशा एक रेडिएशन एमिट करते रहते हैं, जिसे आज हम Hawking रेडिएशन के नाम से जानते हैं।
इसके बारे में विस्तार से हम दुसरे एपिसोड में जानेंगे। फिलहाल आप केवल यह जानिए कि ब्लैक होल्स हमेशा रेडिएशन एमिट करते रहते हैं जिसे ब्लैक होल इवेपोरेशन भी कहते हैं। इसके कारण उनका मास और एनर्जी धीरे-धीरे घटता रहता है। इसलिए ऐसे ब्लैक होल्स जिनके पास निगलने के लिए कुछ भी नहीं होता, वह अपने अंदर मौजूद मास और एनर्जी धीरे-धीरे रेडिएशन के फॉर्म में एमिट करते-करते पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं। यानी कि इस थेओरी के अनुसार आप ब्लॉक होल्स को यूनिवर्स रीसाइक्लिंग मशीन कह सकते हैं। Stephen Hawking ने अपनी इस थेओरी को सन 1974 में क्वांटम मैकेनिक्स के laws के आधार पर prove किया।
ब्लैक होल्स को लेकर एक सवाल आपके मन में यह भी आ सकता है कि अगर ये हमें दिखाई नहीं देते तो हमें पता कैसे चलता है कि इनका एक्जिस्टेंस है और यह कहां मौजूद है। यह बिल्कुल सच है कि पावरफुल ग्रेविटी के कारण लाइट भी ब्लैक होल से होकर वापस नहीं आ पाती। जिस कारण हमें यह दिखाई नहीं देते, पर उनके इर्द-गिर्द मौजूद बॉडीज पर इनके पॉवरफुल ग्रेविटी के प्रभाव के आधार पर हम बता सकते हैं कि वहां पर एक ब्लैक होल मौजूद है। जैसे अगर कोई तारा स्पेस में किसी खास पॉइंट का चक्कर लगा रहा हो और वहां हमें कोई ऑब्जेक्ट दिखाई ना दे रहा हो तो इस बात के काफी चांसेज होते हैं कि वह तारक किसी ब्लैक होने का चक्कर लगा रहा हो। अगर दूसरे तरीके की बात करें तो जब एक तारा ब्लैक होल के नजदीक में चक्कर लगाता है तो वहां हाई एनर्जी लाइट प्रोड्यूस होता है। साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट से हम इस खास तरह के लाइट को डिटेक्ट कर लेते हैं, जिससे पता चल जाता है कि वहां निश्चित रूप से एक ब्लैक होल मौजूद है। तीसरे तरीके की बात करें तो कई बार ब्लैक होल की ग्रेविटी इतनी ज्यादा अधिक होती है कि वह अपना चक्कर लगा रहे नजदीकी तारे के बाहरी गैसेस को अपनी ओर एक डिस्क के आकार में खींचने लगते हैं। इस डिस्क को हम Accretion डिस्क कहते हैं।
जब ये गासेस Accretion डिस्क से ब्लैक होल में जाते हैं तो फ्रिक्शन के कारण काफी हीट प्रोड्यूस होती है, जिससे चारों तरफ x-rays का एमिट्शन होता है। हमारे टेलिस्कोप इन x-rays को कैप्चर कर इनका अध्ययन करते हैं ब्लैक होल एक ऐसी मिस्ट्री है जिसे अगर हमने सुलझा लिया, तो हम इस ब्रह्मांड तथा ग्रेविटी को और बेहतर तरीके से समझ पाएंगे।

दोस्तों आज के इस एपीसोड में बस इतना ही आशा करता हूं कि ये एपिसोड आपको पसंद आया होगा। अगर ऐसा है तो शेयर करना ना भूले। अगर आप इस वेबसाइट पर नए हैं तो इसे सब्सक्राइब जरूर करें। मिलेंगे अगले एपीसोड में तब तक के लिए नमस्ते।

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